बुधवार, १२ ऑगस्ट, २०२०

वेंदों-में-विज्ञान


Thursday, January 14, 2010

वेंदों-में-विज्ञान

hamen in granthon par vichhar karna chahiye,, dekho 


वेदों में पृथ्‍वी खडी है
यह बात चौथी कक्षा का विद्यार्थी भी जानता है कि यह घूमती है लेकिन वेदों में लिखा पृथ्‍वी खडी है
यः पृथ्‍वी व्‍यथमानामद्रहत् यः जनास इंद्रः--- ऋ. 2/12/2
अर्थात है मनुष्‍यो, जिसने कांपती हुई पृथ्‍वी को स्थिर किया, वह इंद्र है


वेदों का घूमता सूर्य
प्रारंभिक स्कूल का विद्यार्थी भी जानता है सूर्य वहीं खडा है वेदों में सूर्य को रथ पर सवार होकर चलने वाला कहा गया है

उदु तयं जातवेदसं देवं वहन्ति केतवः,
दृशे विश्‍वाय सूर्यम ----- ऋ. 1/50/1

अर्थात सूर्य प्रकाशमान है और सारे प्राणियों को जानता है. सूर्य के घोडे उसे सारे संसार के दर्शन के लिए ऊपर ले जाते हैं

वेदों में ग्रहणों के संबंध में जो जानकारी भरी हुई है उसे पढ लेने के बाद कोई जरा सी बुद्धि‍ रखने वाला व्‍यक्ति भी वेदों में विज्ञान ढूंडने की बात न करेगा
सूर्य ग्रहण के बारे में ऋग्‍वेद का कहना है कि सूर्य को स्‍वर्भानु नामक असुर आ दबोचता है और अत्रि व अत्रिपुत्र उसे उस असुर से मुक्‍त करते हैं, तब ग्रहण समाप्‍त होता है.
(क)
यतृत्‍वा सूर्य स्‍वर्भानुस्‍तमसाविध्‍यदासुरः
अक्षेत्रविद् यथा गुग्‍धो भुवनान्‍यदीधयुः -- ऋ 5/ 40/ 5

इसी प्रकार अथर्ववेद 19/ 9/ 10 में चंद्र को ग्रहण लगाने वाला राहू असुर बताया गया है

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http://www.scribd.com/doc/24669586/वेंदों-में-विज्ञान

5 comments:

  1. vedo ki jay ho. thanks brother

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  2. agar prithvi kaap rahi hoti to tu prithvi par khada bhi nahi ho sakte tha. aur वेदों में सूर्य को रथ पर सवार होकर चलने वाला कहा गया है na ki khumana wala jabki kuran mai prithvi ko chapati bataya gaya hai.

    Reply
  3. त्वं बलस्य गोमतोSपावरद्रिवो बिलम् |
    त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः ||5||
    ऋग्वेद 1|11|5||

    हे वज्रधारी इन्‍द्रदेवङ आपने गौओं (सूर्य-किरणों) को चुराने वाले असुरों के व्‍यूह को नष्‍ट किया, तब असुरों से पराजित हुए देवगण आपके साथ आकर संगठित हुए 1-11-5
    http://www.vedpuran.com/brahma.asp?bookid=24&secid=1&pageno=0001&Ved=Y


    आर्य समाजी भाई लिखते हैं

    वेदो में विज्ञान व शिल्पविद्या के रहस्य (26)

    त्वं बलस्य गोमतोSपावरद्रिवो बिलम् |
    त्वां देवा अबिभ्युषस्तुज्यमानास आविषुः ||5||
    ऋग्वेद 1|11|5||

    भाषार्थ -
    जैसे सूर्य्यलोक अपनी किरणों से मेघ के कठिन बद्दलों को छिन्न भिन्न करके भूमि पर गिराता हुआ जल की वर्षा करता है, क्योंकि यह मेघ उसकी किरणों में ही स्थिर रहता, तथा इसके चारों ओर आकर्षण अर्थात् खींचने के गुणों से पृथिवी आदि लोक अपनी अपनी कक्षा में उत्तम उत्तम नियम से घूमते हैं, इसी से समय के विभाग जो उत्तरायण, दक्षिणायन तथा ऋतु, मास, पक्ष, दिन, घड़ी, पल आदि हो जाते हैं, वैसे ही गुणवाला सेनापति होना उचित है ||5||
    http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1347

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  4. हे इन्‍द्रदेवङ अपनी माया द्वारा आपने 'शुष्‍ण' (एक राक्षस) को पराजित किया, जो बुद्धि‍मान् आपकी इस माया को जानते हैं, उन्‍हें यश और बल देकर वृद्धि‍ प्रदान करें 7
    http://www.vedpuran.com/brahma.asp?bookid=24&secid=1&pageno=0001&Ved=Y

    देखो अदल बदल कर वेदों में विज्ञान कैसे घुस जाएगा
    http://www.aryasamaj.org/newsite/node/1347

    मायाभिरिन्द्र मायिनं त्वं शुष्णमवातिरः | 
    विदुष्टे तस्य मेधिरास्तेषां श्रवांस्युत्तिर ||7|| 
    ऋग्वेद 1|11|7||

    पदार्थ -

    हे परमैश्‍वर्य को प्राप्त कराने तथा शत्रुओं की निवृत्ति करानेवाले शूरवीर मनुष्य !
    त्वम्.............तू उत्तम बुद्धि सेना तथा शरीर के बल से युक्त हो के
    मायाभिः..........विशेश‌ बुद्धि के व्यवहारों से
    शुष्णम्...........जो धर्मात्मा सज्जनों का चित्त व्याकुल करने
    मायिनम्.........दुर्बुद्धि दुःख देनेवाला सब का शत्रु मनुष्य है, उसका
    अवातिर..........पराजय किया कर,
    तस्य.............उसके मारने में
    मेधिराः...........जो शास्त्रों को जानने तथा दुष्टों को मारने में अति प्रवीण मनुष्य हैं, वे
    ते.................तेरे सङ्गम से सुखी और अन्नादि पदार्थों को प्राप्त हों,
    तेषाम्............उन धर्मात्मा पुरुषों के सहाय से शत्रुओं के बलों को
    उत्तिर.............अच्छी प्रकार निवारण कर ||7||

    बुद्धिमान मनुष्यों को ईश्‍वर आज्ञा देता है कि - साम, दाम, दण्ड और भेद की युक्ति से दुष्ट और शत्रु जनों की निवृत्ति करके विद्या और चक्रवर्ति राज्य की यथावत् उन्नति करनी चाहिये तथा जैसे इस संसार में कपटी, छली और दुष्‍ट पुरुष वृद्धि को न प्राप्त हों, वैसा उपाय निरन्तर करना चाहिये ||7||

    Reply
  5. प्रारंभिक स्कूल का विद्यार्थी भी जानता है सूर्य वहीं खडा है वेदों में सूर्य को रथ पर सवार होकर चलने वाला कहा गया है
    SURYA AKASHGANGA KA CHHAKAR LAGATA HAI AUR PRARAMBHIK SCHOOL KA BACHHA BHI JANTA HAI KI SURYA BHI GHUMTA HAI 
    AAP PAHLE AAPNA KHAGOLIYA GYAN SUDHARE FIR LIKHE

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